Sunday, March 05, 2006

बातें तुम्हारी प्रिये...

लहराती नदियों-सी होकर भी गहरी।
बातें तुम्हारी प्रिये क्यों ठहरी-ठहरी।

मैं तो एक झरना हूँ, रुक जाऊँ कैसे?
छाती पे पत्थर की ठुक जाऊँ कैसे?
मीन-सी तड़प रही है मेरी प्रतीक्षा में
देखो तुम्हारी प्रिये एक-एक लहरी।

मैं तो एक बादल हूँ, बाँहों में भर लो।
काजल समान प्रिये आँखों में धर लो।
ख़त्म नहीं होऊँगा किंतु तेरे अंबर से
बार-बार बरसूँगा संझा-दुपहरी।

मन पे उदासी न छाने दो हमदम
आज मुझे रोको न, गाने दो हमदम
तेरे सितार भी जो उँगलियों से छेड़ दें
गीत लिखूँ या कि कोई कविता सुनहरी।

छाँव तो धूप की छाया है प्रियतम
धूप संग पड़ते हैं छाँव के भी क़दम।
धूप को जो ओढ़ लो तो छाँव बिछ जाती
आँचल-सी फिरती है ज्यों फहरी-फहरी।

लहराती नदियों-सी होकर भी गहरी।
बातें तुम्हारी प्रिये क्यों ठहरी-ठहरी।

(1 मार्च, 2006)

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Friday, March 03, 2006

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अभिरंजन कुमार