Monday, November 02, 2009

तथाकथित धर्मनिरपेक्षों, बुद्धिजीवियों और सामाजिकों का कच्चा चिट्ठा

सिख दंगों के 25 साल हो गए, करीब तीन हज़ार निर्दोष लोग बेदर्दी से क़त्ल कर दिए गए, लेकिन इंसाफ़ किस चिड़िया का नाम है, क्या आपको मालूम है? अफ़सोस की बात ये है कि धर्म के नाम पर देश के इतिहास का ये सबसे बड़ा क़त्लेआम उन लोगों ने किया, जो माथे पर धर्मनिरपेक्षता की पट्टी चिपकाकर घूम रहे हैं। मैं देश और दुनिया के किसी भी हिस्से में किसी भी मकसद के लिए हुई ऐसी हिंसा की घोर भर्त्सना करता हूँ, जिसमें बेगुनाहों की जान जाती हो। मेरी नज़र में हर इंसानी जान की कीमत बराबर है, चाहे वो हिन्दू की जान हो, या मुसलमान की, या सिख या ईसाई की, लेकिन क्या हमारे देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल और लोग ऐसा मानते हैं? अगर मानते होते तो फिर क्या बात थी कि गुजरात दंगे पर इंसानियत के पुतले बने ये लोग 1984 के सिख दंगों की चर्चा तक नहीं करना चाहते। कहाँ है इंसाफ आज 25 साल बाद? माफ़ करें, आप मुझे जो भी समझें, मेरी नज़र में इस देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष और तथाकथित सांप्रदायिक दल- सब एक जैसे हैं, उनमें कोई फर्क नहीं है। मेरी यही पीड़ा मेरी कविता "बुद्धिजीवी की दुकान" में व्यक्त हुई है। यह कविता 2003 में लिखी गई और 2006 में प्रकाशित मेरे दूसरे काव्य-संग्रह "उखड़े हुए पौधे का बयान" में संकलित है। कृपया आप भी इसे देखें-

बुद्धिजीवी की दुकान

"मैं गुजरात में 1,000 मुसलमानों के क़ातिलों को साम्प्रदायिक कहूँ / और दिल्ली में 3,000 सिखों के हत्यारों को धर्मनिरपेक्ष तो चौंकना मत/ क्रिया के बाद प्रतिक्रिया सिद्धांत देने वाले मुख्यमंत्री को दंगाई कहूँ/ और बड़ा पेड़ गिरने के बाद धरती हिलने का सिद्धांत देने वाले / प्रधानमंत्री को मिस्टर क्लीन / तो भी कर लेना यक़ीन।

जिन्होंने पचास साल में एक भी दंगापीड़ित को न्याय नहीं दिलाया/ जिन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के इंसाफ़ को दिखा दिया ठेंगा- / उनकी आरती उतारूँगा मैं / और अपनी प्रतिबद्धता साबित करने के लिए / गिनूँगा सिर्फ़ दूसरे पक्ष के कुकर्म/ मेरी नज़र में मस्जिद ढहाने वाले तो साम्प्रदायिक हैं / लेकिन राजनीतिक फ़ायदे के लिए / मंदिर का ताला खुलवाने वाले दूध के धुले

मैं भूल जाता हूँ कि अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो की नीति / इस देश के सभी सत्तालोलुपों में एक-सी लोकप्रिय है / और सबने सेंकी हैं जलती चिताओं पर स्वार्थ की रोटियाँ / उत्तर से दक्षिण तक, पूरब से पश्चिम तक / जो शातिर हैं, वो जा कर उन चिताओं पर बहा आते हैं आँसू / जो दुस्साहसी, वो दूर से करते हैं अट्टहास / पर सत्ता दोनों को चाहिए अपने पास।

जानता हूँ कि मेरी कानी सोच से कभी ख़त्म नहीं होगी साम्प्रदायिकता / फिर भी दो साम्प्रदायिकों की लड़ाई में मुझे एक को धर्मनिरपेक्ष कहना है / आख़िर मुझे भी इस बाज़ार में रहना है ! "

पूरी कविता पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

लेखक की साइट का होम पेज- http://www.abhiranjankumar.com

2 comments:

परमजीत बाली said...

वास्तव मे धर्मनिरपेक्षता का नाम लेकर सरकारे देश को बेवकूफ बनाती हैं....यदि न्याय देना होता तो यह बहुत पहले ही दे दिया गया होता......्सब लिपा पोती है....२५ साल बीत जाने पर सबूत भी कहाँ रहते हैं....आप ने अपने लेख में कड़वी लेकिन बिल्कुल सच्ची बात लिखी है।धन्यवाद।

prashant said...

सच्ची बात कही है भाई बधाई